| 000 | 03083nam a22002297a 4500 | ||
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| 005 | 20251118160557.0 | ||
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| 020 | _a9789360867287 | ||
| 028 |
_a: CBS Publishers & Distributors _b: 204, F.I.E. , Industrial Area, Patparganj, New Delhi. _c: COR/IN/26/7699 _d: 05/11/2025 |
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| 082 | _a305.42 NIV | ||
| 100 | _aNivedita, Menon. | ||
| 245 |
_aNaariwadi nigah se _c/Menon Nivedita. |
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| 260 |
_a, New Delhi _b: Rajkamal Prakashan _c , 2024. |
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| 300 |
_a238p. _c: 24cm. |
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| 365 | _b556.50 | ||
| 520 | _aइस किताब की बुनियादी दलील नारीवाद को पितृसत्ता पर अन्तिम विजय का जयघोष सिद्ध नहीं करती। इसके बजाय वह समाज के एक क्रमिक लेकिन निर्णायक रूपान्तरण पर ज़ोर देती है ताकि प्रदत्त अस्मिता के पुरातन चिह्नों की प्रासंगिकता हमेशा के लिए ख़त्म हो जाए। नारीवादी निगाह से देखने का आशय है मुख्यधारा तथा नारीवाद, दोनों की पेचीदगियों को लक्षित करना। यहाँ जैविक शरीर की निर्मिति, जाति-आधारित राजनीति द्वारा मुख्यधारा के नारीवाद की आलोचना, समान नागरिक संहिता, यौनिकता और यौनेच्छा, घरेलू श्रम के नारीवादीकरण तथा पितृसत्ता की छाया में पुरुषत्व के निर्माण जैसे मुद्दों की पड़ताल की गई है। एक तरह से यह किताब भारत की नारीवादी राजनीति में लम्बे समय से चली आ रही इस समझ को दोबारा केन्द्र में लाने का जतन करती है कि नारीवाद का सरोकार केवल ‘महिलाओं’ से नहीं है। इसके उलट, यह किताब बताती है कि नारीवादी राजनीति में कई प्रकार की सत्ता-संरचनाएँ सक्रिय हैं जो इस राजनीति का मुहावरा एक दूसरे से अलग-अलग बिन्दुओं पर अन्तःक्रिया करते हुए गढ़ती हैं। | ||
| 650 | _aHindi | ||
| 650 | _aHindi Fiction | ||
| 650 | _aHindi Collection | ||
| 700 | _aMenon Nivedita | ||
| 942 | _cBOOK | ||
| 999 |
_c66628 _d66628 |
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